ROE (रिटर्न ऑन इक्विटी) क्या है?
ROE बताता है कि कंपनी शेयरधारकों के पैसे पर कितना मुनाफ़ा कमाती है। यह जाँचने का मुख्य पैमाना कि कारोबार पूँजी को कितनी कुशलता से कमाई में बदलता है।
रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) मुनाफ़े को शेयरधारकों की इक्विटी के प्रतिशत के रूप में मापता है — यानी मालिकों द्वारा लगाई पूँजी और रोके गए मुनाफ़े पर रिटर्न। यह पूछता है: मालिकों के हर ₹100 पर कंपनी साल में कितना मुनाफ़ा बनाती है? लगातार ऊँचा ROE अच्छे कारोबार की पहचान है।
भारत में लगातार ~15% से ऊपर का ROE आमतौर पर ऐसी कंपनी का संकेत है जो शेयरधारकों की संपत्ति अच्छे से बढ़ाती है। पर देखें कि यह कैसे हासिल हुआ: भारी कर्ज़ से ROE फूल सकता है (कर्ज़ रिटर्न बढ़ाता है, जब तक उल्टा न पड़े)। कम कर्ज़ के साथ ऊँचा ROE सबसे बढ़िया है।
ROE का उपयोग एक ही क्षेत्र की कंपनियों की तुलना और समय के साथ एक कंपनी को ट्रैक करने में करें। गिरता ROE एक शुरुआती चेतावनी हो सकती है कि वृद्धि मुश्किल हो रही है या कंपनी रिटर्न बनाए रखने के लिए जोखिम उठा रही है।
फ़ॉर्मूला
ROE = शुद्ध मुनाफ़ा ÷ शेयरधारकों की इक्विटी × 100
उदाहरण
₹1,000 करोड़ इक्विटी पर ₹200 करोड़ कमाने वाली कंपनी का ROE 20% है — यानी मालिकों के हर ₹100 को वह सालाना ₹20 मुनाफ़े में बदलती है।
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आम सवाल
अच्छा ROE कितना होता है?
भारत में लगातार ~15% से ऊपर का ROE मज़बूत माना जाता है, पर उसी उद्योग के भीतर तुलना करें। ख़ास तौर पर देखें कि ऊँचा ROE असली कुशलता से है या भारी कर्ज़ से।
ROE और ROCE में क्या फ़र्क़ है?
ROE सिर्फ़ शेयरधारकों की इक्विटी पर रिटर्न मापता है; ROCE कर्ज़ समेत पूरी पूँजी पर। अलग-अलग कर्ज़ स्तर वाली कंपनियों की तुलना के लिए ROCE बेहतर है।